1907 में लायलपुर में जन्में इस क्रांतिकारी ने *भगत सिंह* और *राजगुरु* के साथ मिलकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।
लाहौर में अपने संगठन *HSRA की बम फैक्ट्री* के बारे में पता चलने पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। वे इस बात से खुश थे कि इस बात से पूरे महकमे में हलचल मचेगी। गिरफ़्तार होने पर उन्होंने कह, _”अच्छी बात है कि सब कुछ सामने आ गया! मैं गिरफ़्तारी को सौभाग्य मानता हूँ।”_
हम बात कर रहे हैं – *श्री सुखदेव थापर* की। आज उनका *जन्मदिन* है।
1930 के *लाहौर षडयंत्र केस (सॉन्डर्स हत्याकांड)* में मुख्य आरोपी थे। HSRA के साथी शिव वर्मा अपने संस्मरण, *‘संस्मृतियाँ’* में सुखदेव के बारे में लिखते हैं: _”वास्तव में, भगत पार्टी के राजनीतिक गुरु थे; और सुखदेव आयोजक थे – जिन्होंने ईंट-ईंट जोड़कर इसकी इमारत खड़ी की…”_
केस का शीर्षक ही था, *‘क्राउन बनाम सुखदेव और अन्य’*। 25 आरोपियों की सूची में *भगत सिंह 12वें स्थान* पर थे। जबकि *राजगुरु 20वें स्थान* पर हैं। जिससे पता चलता है कि सुखदेव संगठन का नेतृत्व करते थे।
*अप्रैल 1929 में केंद्रीय विधानसभा में* बम गिराने की योजना के लिए HSRA की केंद्रीय समिति ने पहले भगत सिंह को इस काम के लिए भेजने से इनकार कर दिया था। सुखदेव उस बैठक से अनुपस्थित थे।
पार्टी को *भगत सिंह को भेजने में डर था,* क्योंकि सॉन्डर्स की हत्या में शामिल होने के कारण पंजाब पुलिस उनके पीछे थी। उनकी गिरफ़्तारी का मतलब होता – मौत।
*शिव वर्मा अपने संस्मरणों में कहते हैं,* _”सुखदेव ने फैसले का पुरजोर विरोध किया। उन्हें यकीन था कि भगत से बेहतर HSRA के उद्देश्यों को कोई नहीं बता सकता। उन्होंने भगत को सबके सामने कायर कहा।”_
_“जितना अधिक भगत ने सुखदेव का खंडन किया, सुखदेव उतने ही कठोर होते गए। अंततः भगत ने सुखदेव से कहा कि वह उनका अपमान कर रहे हैं, लेकिन सुखदेव ने कहा कि वह केवल अपने मित्र के प्रति अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।”_
*दिल पर पत्थर रखकर उन्होंने अपने दोस्त को मौत के मुँह में धकेल दिया,* _”समिति को अपना निर्णय बदलना पड़ा और भगत को बम गिराने के लिए चुना गया। सुखदेव उसी शाम बिना कुछ कहे लाहौर चले गए।”_
_“दुर्गा भाभी के अनुसार, जब सुखदेव अगले दिन लाहौर पहुँचे, तो उनकी आँखें सूजी हुई थीं। वह अपने निर्णय पर पूरी रात फूट-फूट कर रोए थे। ऐसे थे सुखदेव – फूल से भी अधिक कोमल और पत्थर से भी अधिक कठोर। लोगों ने केवल उनकी कठोरता को देखा। अपनी कोमलता को हमेशा छुपाते रहे।”_
23 मार्च, 1931 को फाँसी से कुछ दिन पहले *गाँधी जी को लिखे पत्र में उन्होंने कहा,* _”लाहौर षडयंत्र मामले के तीन कैदी जिन्हें मृत्युदंड दिया गया है, संयोग से उन्हें देश में सबसे अधिक लोकप्रियता हासिल हुई है।_
_वास्तव में, उनकी सजा में बदलाव से देश को उतना लाभ नहीं होगा, जितना कि उन्हें फाँसी दिए जाने से होगा।”_
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आम-आदमी के भीतर *क्रांति की लौ* जगाने के लिए हज़ारों क्रांतिकारी शहीद हो गए।
उनकी *शहादत* के लगभग *100 साल बाद* आज हम कहाँ खड़े हैं?
➖ जो भारत उनके दिल के इतना क़रीब था – *आज वो क्लाइमेट चेंज के चलते तबाही की कगार पर खड़ा है,* और भारतीयों को खबर भी नहीं।
➖ भारत में *90% से अधिक महिलाएँ* आर्थिक रूप से परनिर्भर हैं। कैसा लगता हमारे क्रांतिकारी वीरों को जब उन्हें पता चलता कि बहनों के सशक्तिकरण में भारत सबसे पिछड़े देशों में आता है, और महिला उत्पीड़न में सबसे अग्रणी?
➖ भारत में पिछले *10 वर्षों* में आत्महत्याओं के *70% मामले छात्र-आत्महत्या* के हैं। HSRA की जो पूरी सदस्यता थी वो 100% छात्रों की ही थी। जो छात्र शोषकों के ख़िलाफ़ फाँसी पर झूल सकते थे, वो विवश होकर अपने घरों में फंदों पर झूल रहे हैं।
➖भारत *प्रेस स्वतंत्रता* मानकों में *161वें* पायदान पर आता है, *आर्थिक असमानता* मानकों में *126वें* पायदान पर आता है। स्वतंत्रता के लिए ही सुखदेव और भगत सिंह ने जान दी, और सौ साल बाद भी भारत स्वतंत्रता के सभी मानकों में बहुत पिछड़ा हुआ है।
आज *भारत* में एक बार फिर *क्रांति की लौ* जगाने की आवश्यकता है।
हिंदी साहित्य के 10 कालजयी उपन्यास
हिंदी साहित्य का संसार अत्यंत विशाल है, लेकिन कुछ ऐसी कृतियां हैं जिन्होंने समय की सीमाओं को लांघकर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। इन


































